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Monday, 26 December 2011

जीत का अग्निपथ....





                                                                                                                                                                                                इस वर्ष की संभवतः सबसे प्रतीक्षित टेस्ट श्रृंखला का आज एक बेहतरीन आग़ाज़ हुआ. बेहतरीन इसलिए  क्योंकि न तो बल्लेबाज़ पूर्णतः गेंदबाजों पर हावी हो पाए, बल्कि गेंदबाजों ने ही बल्लेबाजों को ज़्यादातर समय परेशान किया. यह बात और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है, क्योंकि गेंदबाज़ भारतीय थे और बल्लेबाज़ ऑस्ट्रेलियाई. वो भी ऑस्ट्रेलिया की ही सरज़मीं पर. इसके शानदार आग़ाज़ के पीछे मैं एक और कारण मानता हूँ जो कि आज के सन्दर्भ में शायद सबसे सटीक बैठता है और ये है दर्शकों की संख्या. लगभग सत्तर हज़ार दर्शकों की मौजूदगी में चार टेस्ट मैचों की सीरीज़ का पहला मैच आज मेलबोर्न के 'मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड' में  शुरू हुआ. एक ऐसे दौर में जब तेज़-तर्रार और छोटे प्रारूप का खेल अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है और क्रिकेट के इस पारंपरिक स्वरुप के अस्तित्व को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं,  तब किसी टेस्ट मैच में इतनी संख्या में दर्शकों की उपस्थिति बेहद शानदार और सुखद अनुभूति देती है.

              गौरतलब है कि आज 'बॉक्सिंग डे' ( क्रिसमस के अगले दिन २६ दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में बॉक्सिंग डे के नाम से जाना जाता है ) पर शुरू हुई 'भारत-ऑस्ट्रेलिया' के बीच की इस श्रृंखला को मीडिया ने "अग्निपथ सीरीज़" नाम दिया है. अगर भारत के ऑस्ट्रेलिया में पिछले छः दशकों के रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो यह शीर्षक उपयुक्त लगता है. भारत आज तक एक बार भी ऑस्ट्रेलिया से उस की ही धरती में टेस्ट श्रृंखला नहीं जीत सका है. भारत ने ऑस्ट्रेलिया में अभी तक खेले गए कुल ३६ टेस्ट मैचों में से महज़ ५ में ही जीत दर्ज की है. ऐसे में तो यही कहा जा सकता है, कि भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया में अपना रिकॉर्ड सुधारने की राह बेहद मुश्किल है. हालाँकि महज़ रिकॉर्ड के आधार पर भारत की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता. यह बात तब और भी पुख्ता हो जाती है, जब हम बीते कुछ सालों में भारत के प्रदर्शन पर नज़र डालते हैं. हालाँकि मैं यहाँ पर इन रेकॉर्डों का कोई भी उल्लेख नहीं करने जा रहा हूँ. 

               अगर दोनों ही टीमों के मौजूदा प्रदर्शन को आधार बनाएं, तो यह सीरीज़ दोनों ही टीमों के लिए अग्निपथ श्रृंखला है. भारत इस समय विश्व रैंकिंग में दूसरे जबकि ऑस्ट्रेलिया चौथे स्थान पर है. भारतीय टीम ने हाल के कुछ महीनों में बेहद शानदार प्रदर्शन किया है ( अगर इंग्लैंड के दौरे को छोड़ दें तो ) और कुछ समय पूर्व तक विश्व की नंबर १ टीम का ताज धारण किये हुए थी. फिर भी भारतीय टीम के लिए अपना रिकॉर्ड सुधारने की चुनौती बेहद मुश्किल है. दूसरी ओर ऑस्ट्रेलियाई टीम है, जो पिछले कुछ समय से बहुत ही कठिन दौर से गुज़र रही है. टीम का प्रदर्शन बीते महीनों में निराशाजनक रहा है. टीम ने न केवल विश्व विजेता का खिताब गंवाया है, बल्कि रैंकिंग में पहला स्थान भी खोया है. एडम गिलक्रिस्ट, ग्लेन मैक्ग्रा, शेन वार्न और हेडन जैसे बड़े खिलाड़ियों के सन्यास लेने के बाद से ऑस्ट्रेलियाई टीम के खेल का स्तर गिरा है. टीम संक्रमण के दौर से गुज़र रही है.....और कई वरिष्ठ खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं. ऐसे में ये सीरीज़ ऑस्ट्रेलिया के लिए भी काँटों से भरी होने वाली है. ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही धरती पर अपने वर्चस्व को बनाये रखना है, जिसे लगातार चुनौती मिल रही है. हालाँकि ऑस्ट्रेलिया को कम से कम उसके ही मैदान में मात देना इतना आसान नहीं है. ऐसे में ये श्रृंखला दोनों ही टीमों के लिए अग्निपथ कि तरह ही होने वाली है....

                 एक पहलू और है, जो इस सीरीज़ में बहुत ही महत्वपूर्ण है और वह है, टीमों का व्यवहार. खासतौर  पर ऑस्ट्रेलियन टीम का व्यवहार. २००७-०८ में भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे को शायद ही कोई भूला होगा. सिडनी टेस्ट में जितनी ख़राब अम्पायरिंग देखने को मिली थी, उतना ही बुरा बर्ताव ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने किया. पहले तो खेल भावना का उल्लंघन करते हुए गलत तरीके से भारतीय खिलाड़ियों को आउट करने का दावा किया, जिसमे उन्हें अम्पायरों का भी सहयोग मिला, उसके बाद भारतीय स्पिनर हरभजन सिंह के खिलाफ नस्लवाद का झूठा आरोप भी लगाया. इन सब घटनाओं से वह दौरा बीच में ख़त्म होने कि कगार पर पहुँच गया था. इसलिए इस सीरीज़ में इस पक्ष पर भी सभी की नज़र रहेगी.  

                                    
 बहरहाल, सीरीज़ का शुभारम्भ हो चूका है. दरअसल शुभारम्भ इसलिए कहा गया है, क्योंकि अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे टेस्ट मैच के लिए इस तरह की संतुलित शुरुआत बेहद अहम है- दर्शकों की भारी संख्या की दृष्टि से भी और गेंद व बल्ले के बीच बराबर की  टक्कर की दृष्टि से भी. दोनों ही टीमों के बीच के इतिहास को देखते हुए यही आशा है कि इस बार की सीरीज़ भी उच्च स्तर का रोमांच दर्शकों में पैदा करेगी. साथ ही ये उम्मीद भी है कि सभी खिलाड़ी स्वच्छ एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से खेल खेलेंगे, खेल भावना का सम्मान करते हुए. साथ ही इसी तरह दर्शक भविष्य में भी टेस्ट मैच के प्रति अपनी रूचि बनाये रखेंगे......
                 अंत में भारतीय होने के नाते यही आशा और दुआ करूँगा कि भारत ही ये श्रृंखला जीते.......सम्मान और गर्व के साथ.           

Monday, 19 December 2011

सचिन तेन्दुलकर - "बस नाम ही काफी है...."

वैसे तो सचिन तेन्दुलकर एक खिलाड़ी के तौर पर अपने खेल से बरसों से विश्व के खेल प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। अपने इसी बेहतरीन खेल के कारण वे शुरुआती दौर से ही खेल प्रेमियों, विशेषतः क्रिकेट के चाहने वालों के दुलारे रहे हैं और उनके बीच चर्चा का विषय रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी इस शख़्स से प्रेरित होकर ही क्रिकेट की ओर आकर्षित हुई है। अतः आज 'सचिन तेन्दुलकर' नाम ही ध्यानाकर्षण का माध्यम बन गया है।
इस माध्यम का लाभ आज अधिक से अधिक लोग उठाने का प्रयास कर रहे हैं। चाहे वह मीडिया हो या कोई खिलाङी या कोई आलोचक या कोई विश्लेषक। खासतौर पर मीडिया ने जिस तरह से सचिन के नाम को आत्मसात् कर लिया है, वह समझने की ज़रूरत है। भारतीय मीडिया के लिये सचिन तेन्दुलकर महज़ एक नाम न होकर एक मुख्य विषय बन गया है, जिस पर लगातार कई दिनों तक 'प्राइम टाइम' पर कार्यक्रम चलाया जा सकता है। फिर चाहे वह सचिन का बनाया गया कोई नया रिकॉर्ड हो या किसी पारी में शून्य पर आउट हो जाना या 100वें शतक का इन्तज़ार हो, हिन्दी-अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं का मीडिया उनकी चर्चाओं से अटा पड़ा रहता है। सचिन की महान उपलब्धियों और उतनी ही बड़ी चर्चाओं का नतीजा है कि भारत सरकार को देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' की पात्रता में परिवर्तन करना पड़ा, जिससे कि अब यह खिलाड़ियों को भी मिल सकता है।
बहरहाल, मुख्य मुद्दे पर लौटते हुए सचिन की बात करते हैं। दरअसल, मीडिया में सचिन के नाम पर होने वाली चर्चा का लाभ कई ऐसे लोग उठाने का प्रयास करते हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना होता है। चाहे वो सचिन के बारे में कोई विवादास्पद टिप्पणी हो या कोई अनूठी बात। वास्तव में ऐसे ही कुछ बयान बीते कुछ दिनों में सुनने को मिले, जिनसे टिप्पणीकार को बेहद चर्चा मिली। इन सबमें सबसे पहला नाम है, पाकिस्तान के विवादास्पद पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख़्तर का। शोएब की सचिन से प्रतिद्वन्दिता जगजाहिर है। इन जनाब ने हाल ही में अपनी आत्मकथा "कंट्रोवर्शली योर्स" जारी की। इस पुस्तक में एक जगह इन्होनें दावा किया कि सचिन हमेशा से इनकी तेज़ गेंदों से डरते रहे हैं। इनके इस दावे पर समस्त मीडिया में हो-हल्ला मचा और लम्बे समय से चर्चा में पाने में असफल रहे शोएब बहुत ही सफलतापूर्वक चर्चा का केन्द्र बन गये।
इन्हीं के एक अन्य पूर्व साथी हैं पूर्व कप्तान शाहिद अफ़्रीदी। इन्होनें न केवल शोएब की बात का समर्थन किया बल्कि ये दावा भी किया कि सचिन तो फ़िरकी गेंदबाज़ सईद अजमल से भी डरते थे और 2011 विश्व कप के सेमीफ़ाइनल मैच में सईद अजमल के सामने सचिन के पैर भी काँप रहे थे। क्रिकेट के जानकारों के लिए भले ही ये सब हास्यास्पद हो, परन्तु इससे अफ़्रीदी को ज़रूर चर्चा मिली। साथ ही उनका तथाकथित 'सन्यास' या कहें वनवास समाप्त हुआ, क्योंकि उपहार स्वरूप पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने उन्हें पुनः राष्ट्रीय टीम के लिये चयनित किया।
ये तो महज़ एक ही उदाहरण है। ऐसे कई अन्य उदाहरण हमें आए-दिन देख़ने को मिल जाते हैं, जो सचिन की शख़्सियत का इस्तेमाल करके अपनी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। इन सबसे उन लोगों को ले ही पल-दो-पल की चर्चा मिले या न मिले, परन्तु इससे 'सचिन तेन्दुलकर' की शोहरत पर ज़रा भी नकारात्मक असर नहीं पड़ता और शायद भविष्य में भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि सच हम भी जानते हैं और "वो" भी...........।।

Sunday, 11 July 2010

नया विश्व विजेता........स्पेन.

फुटबाल विश्व कप २०१० के कल रात खेले गए निर्णायक मुकाबले में स्पेन को विश्व विजेता बनने पर स्पेन को हार्दिक बधाई। निश्चित रूप से स्पेन इस जीत के योग्य था। इसका यह अर्थ नहीं है कि होलैंड की टीम इस जीत के लायक नहीं थी लेकिन जिस तरह से स्पेन ने विश्व कप का अपना पहला ही मैच हारने के बाद जो शानदार वापसी की वह तारीफके काबिल है। स्पेन के खिलाडियों ने बेहतरीन टीम खेल का प्रदर्शन किया।
हालाँकि इस विश्व कप के दौरान जर्मनी के पॉल नामक ऑक्टोपस की भविष्यवाणियाँ भी चर्चा में रही, जो प्रत्येक मैच में सटीक रही। फ़ाइनल में भी उसकी भविष्यवाणी सही साबित हुई। फिर भी हम इसके कारण स्पेन के खिलाडियों से श्रेय नहीं छीन सकते। आखिर फुटबाल की दुनिया में एक नयी शक्ति का उदय हुआ है।
एक बार फिर स्पेन को हार्दिक बधाई।
इसके अतिरिक्त दक्षिण अफ्रीका को भी इस भव्य आयोजन के लिए बहुत-बहुत बधाई।
इस उम्मीद के साथ कि २०१४ में ब्राज़ील में होने वाला विश्व कप और भी अच्छे परिणाम लाये तथा भारतीय टीम भी उस कप में खेले, "अलविदा दक्षिण अफ्रीका".