आजकल देश की राजनीती में लोकपाल, भ्रष्टाचार, आन्दोलन, अन्ना आदि जैसे कई शब्द लगातार गूंज रहे हैं. हालाँकि विगत दस-ग्यारह महीनों से ये सभी शब्द आम जनता की ज़ुबान पर भी छाए हुए हैं, परन्तु राजनीतिक गलियारों में इनका ज़िक्र कुछ ज़्यादा ही हो रहा है. इसके साथ ही एक और शब्द बेहद इस्तेमाल हो रहा है, जो कि वर्तमान सियासी मौसम में हमारे राजनीतिज्ञों की ज़ुबान पर बेहद आम हो जाता है. वर्तमान सियासी मौसम से मेरा मतलब चुनावी मौसम से है. जी हाँ, आने वाले तीन चार महीनो में देश के पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. आपने ये शब्द अक्सर सुना होगा और प्रयोग भी किया होगा. चलिए, बात को ज़्यादा न खींचते हुए मैं आपको बताता हूँ. ये शब्द है - 'स्टंट'(stunt).
बीते कई सालों से हम सब इस शब्द को लगातार सुनते आ रहे हैं. प्रायः फिल्मों में सुनाई देने वाला ये शब्द चुनावों के दौरान हमारे 'माननीय' राजनेताओं के मुख से सुनाई देने लगता है. ये तो हम सभी जानते हैं कि चुनाव का समय आते ही राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक, सभी 'महत्वपूर्ण घोषणाओं' में व्यस्त हो जाते हैं. इनमें से अधिकांश घोषणाएं ऐसी होती हैं, जिनकी मांग आमतौर पर जनता बीते चार सालों ( या कई सालों ) से कर रही होती है परन्तु उन मांगों पर सरकार का नक्कारा रवैया कायम रहता है. लेकिन यही तो चुनावी माया है, कि जो काम कई सालों से नहीं हुआ होता, वो ठीक चुनाव पूर्व संभव हो जाता है. फिर शुरू होता है शब्दों का खेल. और इस खेल का सबसे पहला शब्द 'स्टंट' ही होता है. विरोधी दल किसी भी सरकारी घोषणा को (चाहे केंद्र सरकार करे या राज्य सरकार ) 'चुनावी स्टंट' ही करार देते हैं. वैसे जानते तो हम सब भी हैं, कि ऐसे समय में होने वाली घोषणा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के खातिर ही की जाती है.
ऐसा ही कुछ आजकल देश में चल रहा है. ख़ासतौर पर सियासी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीती में. उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में अपनी जीत दर्ज करने के लिए सभी दल जोर -आज़माइश में लगे हैं. परन्तु वोटरों को लुभाने की चाभी मुख्य रूप से 'बहुजन समाज पार्टी' और 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के हाथ है. और दोनों ही दल इसका भरपूर लाभ लेने में जुटे हुए हैं. हाल के दिनों में हुई कई 'अभूतपूर्व' सरकारी ( केंद्रीय और राज्यीय दोनों ) घोषणाओ से ये ज़ाहिर भी हो चुका है. सबसे पहले प्रदेश की मुख्यमंत्री कुमारी मायावती ने राज्य को चार भागों में बाँटने की घोषणा करके सबको सकते में डाल दिया. ये बात सब जानते हैं कि राज्य को विभाजित करने की मांग वर्षों पुरानी है. ऐसे में ऐन चुनाव से पहले इस घोषणा का महत्व समझा जा सकता है. मायावती के इस ऐलान को सबसे पहले कांग्रेस ने ही चुनावी स्तुंत करार दिया. उसकी देखा-देखी अन्य दलों ने भी इसे तमाशा ही कहा. बहरहाल, केंद्र ने मुख्यमंत्री के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
कुछ ऐसा ही तमाशा कांग्रेस ने भी किया. यू.पी. के इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ चुके राहुल गाँधी की महत्वकांक्षाओं को तुष्ट करने के लिए केंद्र सरकार ने भी राज्य के बुनकरों का कई करोड़ों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है. इस कदम पर सबसे पहले प्रतिक्रिया जताते हुए ब.स.पा. ने भी इसे महज़ एक चुनावी स्टंट बताया. अब कल ही केंद्र सरकार ने एक और ऐलान किया है. सरकार ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अल्पसंख्यकों के लिए भी ४.५ प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की स्वीकृति दे दी है. उत्तर प्रदेश के चुनाव के मद्देनज़र हुई ये घोषणा भी सरकार की चुनावी चाल है. हालाँकि अभी तक किसी भी दल ने आधिकारिक तौर पर इसे चुनावी स्टंट नहीं कहा है, परन्तु हम सब जानते हैं कि इसके पीछे केंद्र सरकार का क्या उद्देश्य है?
बहरहाल, हमें ये समझने की आवश्यकता है कि इन अवसरवादी घोषणाओ से हटकर हमें सही नेतृत्व का चयन करना है. ऐसे 'स्टंट' तो हर चौथे-पांचवे साल होते रहेंगे. अगर हम ही हर तरह की जातिगत, सांप्रदायिक तुष्टिकरण की विचारधारा से ऊपर उठकर अपने प्रतिनिधियों को चुनेंगे तो ये घोषणाएं महज़ चुनावी तमाशा न बनकर विकासपरक और देश को आगे ले जाने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता का भी सूत्रपात करेंगी.
ऐसा ही कुछ आजकल देश में चल रहा है. ख़ासतौर पर सियासी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीती में. उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में अपनी जीत दर्ज करने के लिए सभी दल जोर -आज़माइश में लगे हैं. परन्तु वोटरों को लुभाने की चाभी मुख्य रूप से 'बहुजन समाज पार्टी' और 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के हाथ है. और दोनों ही दल इसका भरपूर लाभ लेने में जुटे हुए हैं. हाल के दिनों में हुई कई 'अभूतपूर्व' सरकारी ( केंद्रीय और राज्यीय दोनों ) घोषणाओ से ये ज़ाहिर भी हो चुका है. सबसे पहले प्रदेश की मुख्यमंत्री कुमारी मायावती ने राज्य को चार भागों में बाँटने की घोषणा करके सबको सकते में डाल दिया. ये बात सब जानते हैं कि राज्य को विभाजित करने की मांग वर्षों पुरानी है. ऐसे में ऐन चुनाव से पहले इस घोषणा का महत्व समझा जा सकता है. मायावती के इस ऐलान को सबसे पहले कांग्रेस ने ही चुनावी स्तुंत करार दिया. उसकी देखा-देखी अन्य दलों ने भी इसे तमाशा ही कहा. बहरहाल, केंद्र ने मुख्यमंत्री के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
कुछ ऐसा ही तमाशा कांग्रेस ने भी किया. यू.पी. के इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ चुके राहुल गाँधी की महत्वकांक्षाओं को तुष्ट करने के लिए केंद्र सरकार ने भी राज्य के बुनकरों का कई करोड़ों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है. इस कदम पर सबसे पहले प्रतिक्रिया जताते हुए ब.स.पा. ने भी इसे महज़ एक चुनावी स्टंट बताया. अब कल ही केंद्र सरकार ने एक और ऐलान किया है. सरकार ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अल्पसंख्यकों के लिए भी ४.५ प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की स्वीकृति दे दी है. उत्तर प्रदेश के चुनाव के मद्देनज़र हुई ये घोषणा भी सरकार की चुनावी चाल है. हालाँकि अभी तक किसी भी दल ने आधिकारिक तौर पर इसे चुनावी स्टंट नहीं कहा है, परन्तु हम सब जानते हैं कि इसके पीछे केंद्र सरकार का क्या उद्देश्य है?
बहरहाल, हमें ये समझने की आवश्यकता है कि इन अवसरवादी घोषणाओ से हटकर हमें सही नेतृत्व का चयन करना है. ऐसे 'स्टंट' तो हर चौथे-पांचवे साल होते रहेंगे. अगर हम ही हर तरह की जातिगत, सांप्रदायिक तुष्टिकरण की विचारधारा से ऊपर उठकर अपने प्रतिनिधियों को चुनेंगे तो ये घोषणाएं महज़ चुनावी तमाशा न बनकर विकासपरक और देश को आगे ले जाने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता का भी सूत्रपात करेंगी.
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