अभी कुछ दिनों पूर्व(१३ दिसंबर) को संसद पर आतंकी हमले के दस वर्ष पूरे हुए. हर साल की ही तरह इस साल भी देश भर में उस हमले में शहीद हुए पुलिस के जवानों को याद किया गया और उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. साथ ही देश के बड़े राजनेताओं ने एक बार फिर रटी-रटाई जुबान में आतंक के खिलाफ दृढ-संकल्प की बात दोहराई. ऐसा ही कुछ विगत
२६ नवम्बर को भी देखने को मिला. मुंबई पर हुए आतंकी आक्रमण की तीसरी बरसी पर भी 'रस्मी' तौर पर ये सभी औपचारिकतायें पूरी की गयीं.
इस सब को रस्मी प्रक्रिया का नाम देने में स्वयं मैं भी आहत होता हूँ. परन्तु इसके लिए विवश हूँ. आखिर इतने वर्षों से हम इन सबके प्रति अपना क्षोभ मौखिक( अर्थात सैद्धांतिक ) रूप में ही तो दिखाते रहे हैं. इन सबको रोकने या आरोपियों के खिलाफ कोई कठोर कदम तो आज तक उठाया नहीं है. ऐसे में अगर इसे महज़ औपचारिकता या रस्म का नाम दिया जा रहा है तो इसमें गलत क्या है? संसद पर हमले के पीछे षड्यंत्रकारी दिमाग यानी अफज़ल गुरु को हम ६ साल बाद भी फंसी पर नहीं चढ़ा सके हैं. और जिस तरह के राजनीतिक हालत देश में बनते रहे हैं, उसको देखते हुए भी यही लगता है कि आगे भविष्य में भी उसे सज़ा शायद ही मिले.
हमारा देश १९९३ के बाद से लगातार आतंकी हमले का शिकार बनता आ रहा है. मुंबई से शुरू होता हुआ ये सिलसिला आज पूरे देश में जारी है. २००८ के मुंबई हमलों के बाद भी सरकार ने कहने को तो एन.आई .ए जैसी संस्था तैयार कर दी परन्तु कोई ऐसा कठोर निर्णय नहीं लिया जो कि आतंकियों के सामने डर पैदा करता. इतना कुछ हो जाने के बाद भी देश पर तीन और आतंकी हमले बीते १८ महीनो में हो गये. कसाब पर पिछले ३ सालों में करीब १६ करोड़ रूपए खर्च किये जा चुके हैं. और अभी तक भी उसे सज़ा नहीं दी गयी है क्यूंकि अभी उसका मुकदमा सर्वोच्च न्यायलय में चल रहा है. हालाँकि जिस तरह से उच्चतम न्यायलय द्वारा मृत्युदंड मुक़र्रर किये जाने के ६ साल बाद भी अफज़ल गुरु को दंड नहीं दिया गया है, उसको देखते हुए अगर भविष्य में कसाब को भी सज़ा नहीं दी जाएगी तो कोई हैरानी वाली बात नहीं होगी.
आम तौर पर इन हमलों को ख़ुफ़िया चूक माना जाता है, परन्तु उससे भी बढ़कर ये राजनीतिक अकर्मण्यता का नतीजा है. ये जानने के बावजूद कि देश में होने वाले आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान संचालित आतंकी सरगनाओं का हाथ होता है, हम न तो पाकिस्तान के खिलाफ कोई कदम उठाते हैं, बल्कि कुछ दिनों के लिए तथाकथित 'कड़ा रुख' अपनाने के बाद स्वयं शांति का प्रस्ताव लेकर पहुँच जाते हैं......कभी बस सेवा शुरू करके तो कभी क्रिकेट श्रंखला शुरू करके......उस पर भी राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण एक बड़े आतंकी को फांसी पर न चढ़ाना हमारी इच्छाशक्ति को और कमज़ोर बनाता है और दुनिया के सामने हमें एक "सॉफ्ट टार्गेट" के रूप में पेश करता है.
भले ही प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार सरकार को ही है, परन्तु इसमें हमें यानी देश के आम नागरिक को भी हिस्सा लेने की ज़रूरत है. मेरे कहने का अर्थ ये है कि भले ही हम सरकार को इन सबके लिए जायज़ रूप से दोषी ठहराएँ, परन्तु इसके लिए कुछ रूप से शायद हम भी ज़िम्मेदार हैं. हमने कभी सरकार पर इन सबके लिए दबाव डालने की कोशिश नहीं की. जिस तरह से हाल ही में देश भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन आन्दोलन चला और सरकार को समय समय पर जन दबाव में मांगें स्वीकार करनी पड़ी, उसी प्रकार अगर हम सब मिलकर अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए और अफज़ल गुरु तथा कसाब को जल्द से जल्द सज़ा दिलाने के लिए जन-आन्दोलन चलायें तो निश्चित रूप से सरकार को कठोर कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. क्यूंकि भले ही हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की है, परन्तु अंततोगत्वा हमारे खुद के प्रयास ही हमें सुरक्षित रखेंगे.......
"अन्यथा हर बार की तरह आगे भी ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी और हमेशा की तरह हम रस्मी तौर पर उन पर मात्र विलाप ही करते रह जायेंगे..........."
आम तौर पर इन हमलों को ख़ुफ़िया चूक माना जाता है, परन्तु उससे भी बढ़कर ये राजनीतिक अकर्मण्यता का नतीजा है. ये जानने के बावजूद कि देश में होने वाले आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान संचालित आतंकी सरगनाओं का हाथ होता है, हम न तो पाकिस्तान के खिलाफ कोई कदम उठाते हैं, बल्कि कुछ दिनों के लिए तथाकथित 'कड़ा रुख' अपनाने के बाद स्वयं शांति का प्रस्ताव लेकर पहुँच जाते हैं......कभी बस सेवा शुरू करके तो कभी क्रिकेट श्रंखला शुरू करके......उस पर भी राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण एक बड़े आतंकी को फांसी पर न चढ़ाना हमारी इच्छाशक्ति को और कमज़ोर बनाता है और दुनिया के सामने हमें एक "सॉफ्ट टार्गेट" के रूप में पेश करता है.
भले ही प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार सरकार को ही है, परन्तु इसमें हमें यानी देश के आम नागरिक को भी हिस्सा लेने की ज़रूरत है. मेरे कहने का अर्थ ये है कि भले ही हम सरकार को इन सबके लिए जायज़ रूप से दोषी ठहराएँ, परन्तु इसके लिए कुछ रूप से शायद हम भी ज़िम्मेदार हैं. हमने कभी सरकार पर इन सबके लिए दबाव डालने की कोशिश नहीं की. जिस तरह से हाल ही में देश भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन आन्दोलन चला और सरकार को समय समय पर जन दबाव में मांगें स्वीकार करनी पड़ी, उसी प्रकार अगर हम सब मिलकर अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए और अफज़ल गुरु तथा कसाब को जल्द से जल्द सज़ा दिलाने के लिए जन-आन्दोलन चलायें तो निश्चित रूप से सरकार को कठोर कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. क्यूंकि भले ही हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की है, परन्तु अंततोगत्वा हमारे खुद के प्रयास ही हमें सुरक्षित रखेंगे.......
"अन्यथा हर बार की तरह आगे भी ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी और हमेशा की तरह हम रस्मी तौर पर उन पर मात्र विलाप ही करते रह जायेंगे..........."
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