कुछ दिनों पहले बिहार विधान सभा में जो भी दृश्य दिखे, बहुत ही शर्मनाक थे। सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले देश में ही लोकतंत्र कि धज्जियाँ उड़ते हुए पुरे देश ने देखा। शायद विदेशों में भी इसका प्रसारण हुआ होगा। हालाँकि अब कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह कोई बड़ी घटना नहीं है, क्योंकि यह लगभग आम बात हो गयी है। कभी बिहार तो कभी कर्नाटक, तो कभी जम्मू एवं कश्मीर की विधान सभाओं में भी ऐसे दृश्य दिख चुके हैं।
अभी कुछ माह पूर्व ही महाराष्ट्र विधान सभा का वह दृश्य भला कौन भूला होगा जब समाजवादी पार्टी के विधायक श्री अबू आज़मी साथ शिवसेना एवं मनसे के विधायकों ने दुर्व्यवहार किया था। मनसे एवं शिवसेना के विधायकों ने श्री आज़मी द्वारा विधान सभा में हिंदी में शपथ लेने पर धक्का-मुक्की की थी। दूसरी तरफ विगत वर्ष जम्मू एवं कश्मीर विधान सभा में विपक्ष की नेता मेहबूबा मुफ्ती ने सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस के विधायकों के साथ असभ्य व्यव्हार किया था। उन्होंने कुछ आवश्यक दस्तावेजों को फाड़ कर फेंक दिया था।
इतना ही नहीं विगत १४वी लोकसभा में एक सत्र के दौरान तृणमूल कांग्रेस की सांसद ममता बनर्जी ने भी कुछ आवश्यक दस्तावेजों का पुलिंदा तत्कालीन अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी पर फेंके थे। आज ऐसे ही कई दृश्य देश की अलग-अलग विधान सभाओं में समय-समय पर देखने को मिल जाते हैं।
इन सब से एक बात स्पष्ट है, आज देश के तथाकथित "सम्मानित नेतागण" अपने नैतिक मूल्य लगभग भूल ही गए हैं। निश्चित ही यह शर्मनाक बात है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए।
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